कड़ियां परंपराओं की

                    होली और  फूलडोल कार्यक्रम 

होली का पावन पर्व है राजभवन पन्हौना से जुड़ी एक विशेष एवं प्राचीन परंपरा के अंतर्गत आता है फूलडोल कार्यक्रम..........

तालुकेदार स्वर्गीय रावत शिवरतन सिंह जी के दरबार राजभवन के प्रांगण में होली के शुभ अवसर पर सुबह से लेकर दोपहर तक चौपाल लगती थी! उस चौपाल में उस वक्त की नामचीन हस्तियों के साथ राज दरबारियों ,पुरोहित उपरोहितों के साथ समस्त ग्राम वासियों के साथ तालुकेदार भांग ठंडाई एवं जलपान के साथ रंग गुलाल अबीर फगुआ के साथ होली खेलते थे! रंग खेलने के पश्चात स्नान ध्यान कर उसी प्रांगण में प्रारंभ होता था पूजा-पाठ कार्यक्रम, 

स्वर्गीय रानी साहिबा राजभवन पन्हौना के प्रांगण में उपस्थित शिव मंदिर में पूजन कर एक डोली में भगवान की प्रतिमा रखकर पूरी ग्राम सभा के  प्रत्येक गांव मे  बारात निकलती थी! यह बारात ग्राम सभा के प्रत्येक परिवार के प्रत्येक दरवाजे तक जाती थी और बारात का कारवां एक दूसरे से जुड़ता जाता था इसे ही फूलडोल कहते हैं !

यह परंपरा ग्राम सभा पन्हौना सिंहपुर अमेठी उत्तर प्रदेश की पावन भूमि को  ऊंच-नीच भेदभाव छुआछूत जातिवादिता की भावना को बिल्कुल अलग करती है इस बारात में सभी लोग समान व्यवहार करते थे एक दूसरे को समान रूप से गले मिलना एक दूसरे के साथ पूरी ग्राम सभा में दरवाजे दरवाजे तक एक दूसरे के साथ जाना और एक दूसरे के साथ होली मिलना! शाम को 6:00 से 9:00 के बीच तक पुनः राज भवन के प्रांगण में फिर से ग्रामसभा वासियों का जमावड़ा होना और उनके मनोरंजन के लिए तालुकेदार जी की तरफ से मनोरंजन के लिए रात्रि में में नाटक का मंचन होता था नाट्य मंचन में राजा हरिश्चंद्र नाटक बहुत ही प्रसिद्ध था! इस नाटक में तालुकेदार शिव रतन सिंह जी के सुपुत्र तालुकेदार रावत कन्हैया बक्स सिंह जी भी प्रतिभाग करते थे उस समय यह नाटक डलमऊ से लेकर अयोध्या तक प्रसिद्ध था! हमारे बचपन में जिस रंगत के साथ इस परंपरा का निर्वहन होता था शायद आज  समयानुसार परिवर्तन नजर आता है युवा पीढ़ी का रुझान कम होता हुआ नजर आ रहा है ! प्रेम और सद्भाव कम होता जा रहा है! फूलडोल के वास्तविक स्वरूप एक डोली दो कहारों के कंधे पर ढोल, नक्कारा, डफला, मृदंग  झीका जैसे वाद्य यंत्रों के साथ सुशोभित यात्रा की जगह पर अब डीजे सॉन्ग और डीजे डांस पर थिरकते युवाओं परंपरा की गरिमा को बनाए रखा है हम आशा और उम्मीद करते हैं हिंदुस्तान की धरती पर इस तरह की भेदभाव छुआछूत जात पात रहित परंपराओं का अनुसरण होते रहना चाहिए जिससे समाज में समता ,ममता, सद्भावना, प्रेम, भाईचारा सौहार्दपूर्ण बना रहे !

"प्राचीन इतिहास " व्यक्तिगत जानकारी के आधार पर

            आपका शिव कृपा विक्रम

            💐🌷Happy Holi🌷💐


टिप्पणियाँ

  1. यह परंपरा सदियों पुरानी है यह सर्व समाज को को होली के पावन पर्व पर एक साथ क्षमता ममता की भावनाओं को जागृत कर एक साथ मिलजुल कर रहने की प्रेरणा देती है!

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