धर्म

 धर्म 

कुछ समय पहले एक होटल पर चाय पीते समय धर्म पर ही चर्चा चल रही थी तब वहां पर एक सज्जन व्यक्ति बैठे थे पेशे से डॉक्टर थे! उन्होंने  कहा कि मैं किसी धर्म को नहीं मानता!

तब उनसे पूछा गया कि आपके परिवार में कौन-कौन हैं! डॉक्टर साहब ने बताया कि हम पति-पत्नी और हमारे दो बच्चे एक बेटी और एक बेटा है!

डॉक्टर साहब से पूछा गया आपकी बेटी और बेटे क्या करते हैं! डॉक्टर साहब ने बताया कि वह दोनों अभी पढ़ते हैं! लड़का ग्रेजुएशन कर चुका, लड़की अभी 12वीं में पढ़ती है!

डॉक्टर साहब से पूछा गया कि जब आप पति- पत्नी घर पर नहीं होते तो बच्चों की देखरेख कौन करता है! डॉक्टर साहब ने कहा कि बच्चे  उम्र के उस दौर में है कि अपनी देखभाल स्वयं कर सकें!

तब सवाल पूछने वाले ने कहा वाह, जी, वाह डॉक्टर साहब, बच्चों के इसी उम्र के दौर में  अपोजिट अट्रैक्शन (मेल- फीमेल आकर्षण) उत्पन्न होता है जो प्राकृतिक है और  इसी दौर में युवक युवतियां गलतियां कर बैठते हैं! लेकिन यहां पर ऐसा क्या है ऐसा कौन सा बंधन है कवच है या चारदीवारी है जो आपके बेटे और बेटी को एक छत, एक कमरा, एक चारपाई पर सोने की इजाजत देता है, लेकिन हमबिस्तर होने से रोकता है, यहां पर डॉक्टर साहब आश्चर्यचकित रह गए और बोले शिक्षा, संस्कार और भाई-बहन का धर्म,

मुझे भी भाई और बहन के बीच में धर्म की अदृश्य दीवार नजर आई! कहीं ना कहीं किसी न किसी जीवन पथ पर हमें धर्म का पालन करना ही पड़ता है!!

जब हम "धर्म का पालन" करते हैं! तब हमारे अंदर "सद्विचार" उत्पन्न होते हैं! सद्विचार सदैव सद्भावना का संदेश देते हैं ! सद्भावना प्रेम उत्पन्न करती है! प्रेम आपको इंसान बनाता है और इंसानियत से रूबरू कराता है फिर इंसानियत जन्म देती है संस्कारों को!

 संस्कार हमें पुनः धर्म के बंधनों से जैसे:- , रक्षाबंधन, परिणय बंधन,सजाकर नैतिक, सामाजिक, आध्यात्मिक व्यक्तित्व को अलंकृत करते हुए जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त करते हैं!

 शिवकृपा विक्रम

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

चल रे कांवरिया शिव के धाम

कड़ियां परंपराओं की

जु़बान